➤ हिमाचल हाईकोर्ट ने आउटसोर्स भर्तियों को लेकर सरकार पर सख्त टिप्पणी की
➤ स्वास्थ्य सचिव और प्रधान सचिव वित्त को 16 जून को व्यक्तिगत रूप से तलब किया गया
➤ 17,114 आउटसोर्स कर्मचारियों और 110 कथित फर्जी एजेंसियों पर उठे सवाल
Himachal Pradesh High Court ने राज्य सरकार के विभिन्न विभागों, बोर्डों और निगमों में बड़े स्तर पर की जा रही आउटसोर्स भर्तियों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कहा कि नियमित पदों को भरने के बजाय बैक डोर एंट्री के जरिए नियुक्तियां की जा रही हैं, जिससे युवाओं के वैधानिक अधिकारों का हनन और उनका शोषण हो रहा है।
मुख्य न्यायाधीश Gurmeet Singh Sandhawalia और न्यायाधीश Bipin Chander Negi की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य सचिव और प्रधान सचिव (वित्त) को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के आदेश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 16 जून को होगी।
अदालत में वित्त विभाग के विशेष सचिव सौरभ जस्सल की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया कि आउटसोर्स कर्मचारियों का डाटा बहुत बड़ा है और यह केंद्रीकृत रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए जानकारी जुटाने में समय लग रहा है। इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जब वर्ष 2017 की नीति के तहत वित्त विभाग की अनुमति के बिना आउटसोर्स नियुक्तियां संभव नहीं हैं, तो सरकार के पास इसका पूरा डाटा उपलब्ध क्यों नहीं है।
अदालत के समक्ष रखे गए अधूरे आंकड़ों के अनुसार राज्य के 42 सरकारी संस्थानों में कुल 17,114 कर्मचारी आउटसोर्स आधार पर कार्यरत हैं। इनमें हाईकोर्ट, न्यायिक अकादमी और एडवोकेट जनरल कार्यालय भी शामिल हैं।
सबसे ज्यादा आउटसोर्स कर्मचारी चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशालय में 2,578 हैं। इसके अलावा Himachal Pradesh State Electricity Board में 1,473, कृषि निदेशालय में 803, CSK Himachal Pradesh Agricultural University में 793, ग्रामीण विकास विभाग में 632, पुलिस महानिदेशक कार्यालय में 630 और जल शक्ति विभाग में 542 कर्मचारी आउटसोर्स आधार पर तैनात हैं।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार बिना व्यावहारिक डाटा के नीतिगत फैसले ले रही है, जो बेहद गलत परंपरा है। अदालत ने यह भी कहा कि मुख्य सचिव को पक्षकार बनाए जाने के बावजूद विभागों का कोर्ट के आदेशों के प्रति उदासीन रवैया गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्सों की भारी कमी का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने बताया कि 31 जुलाई 2024 तक 750 पद खाली थे, लेकिन दिसंबर 2025 में केवल 28 पदों पर नियमित भर्ती निकाली गई। अदालत ने सरकार से पूछा कि बाकी पदों को नियमित रूप से क्यों नहीं भरा गया।
मामले में यह भी सामने आया कि पहले लोगों को आउटसोर्स आधार पर नियुक्त किया जाता है और बाद में रोगी कल्याण समिति के माध्यम से नियमित करने का प्रयास होता है। अदालत ने इसे बैक डोर एंट्री का सुनियोजित तरीका बताया।
याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले में 110 कथित फर्जी आउटसोर्सिंग कंपनियों की जांच सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में एसआईटी से कराने की मांग की है। हाईकोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया बिना पारदर्शी प्रक्रिया के 17,114 लोगों को नौकरी देना और इससे आउटसोर्स एजेंसियों को लाभ पहुंचाना बेहद गंभीर मामला है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों को देखते हुए हाईकोर्ट पहले मामले की मेरिट पर सुनवाई पूरी करेगा।



